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क्या सच में सीमा पर ‘प्राकृतिक पहरेदार’? सांप और मगरमच्छों से निगरानी की तैयारी ने बढ़ाया सस्पेंस

भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा बढ़ाने के लिए BSF सांप और मगरमच्छों की तैनाती पर विचार कर रहा है। जानिए पूरी रणनीति, चुनौतियां और टेक्नोलॉजी का रोल।

भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए एक अनोखे और चौंकाने वाले प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) अब नदी और दलदली इलाकों में सांपों और मगरमच्छों जैसे सरीसृपों के उपयोग की संभावनाएं तलाश रहा है। यह कदम पारंपरिक सुरक्षा उपायों से आगे बढ़कर प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करने की दिशा में एक नई सोच को दर्शाता है। 4,096 किलोमीटर लंबी इस सीमा में कई ऐसे हिस्से हैं जहां निगरानी करना बेहद मुश्किल है, खासकर वे क्षेत्र जो पानी, जंगल और दलदली जमीन से घिरे हैं।

हाई लेवल बैठकों में बनी रणनीति

सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव पर शीर्ष स्तर पर चर्चा हो चुकी है और इसे एक बहु-स्तरीय सुरक्षा योजना का हिस्सा माना जा रहा है। फरवरी और मार्च में हुई उच्च स्तरीय बैठकों में इस विचार को लेकर गंभीर मंथन हुआ। इसके बाद सीमा के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी सेक्टरों में तैनात अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि वे इस प्रस्ताव की व्यवहारिकता का आकलन करें। खासतौर पर उन नदी क्षेत्रों में, जहां निगरानी के लिए मानव या तकनीकी संसाधनों की पहुंच सीमित है, वहां इस विकल्प को परखा जा रहा है।

पहले से मजबूत हो रही टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी

सीमा पर पहले ही कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें ड्रोन, थर्मल इमेजिंग, सेंसर आधारित सिस्टम और नाइट विजन कैमरे शामिल हैं। ‘कंप्रीहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम’ के तहत कई संवेदनशील इलाकों में 24 घंटे निगरानी की व्यवस्था है। इसके अलावा एंटी-कट और एंटी-क्लाइंब बाड़, बिजली युक्त फेंसिंग और AI आधारित कैमरे भी सुरक्षा को मजबूत बना रहे हैं। जवानों को बॉडी-वॉर्न कैमरों और बायोमेट्रिक उपकरणों से भी लैस किया गया है, जिससे हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके।

चुनौतियां और आगे की दिशा

हालांकि सरीसृपों की तैनाती का विचार जितना दिलचस्प है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे लागू करने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव, मानव सुरक्षा और नियंत्रण जैसे पहलुओं पर गहन अध्ययन जरूरी होगा। इसके साथ ही, सीमा पर मौजूद ‘डार्क जोन’ यानी बिना नेटवर्क वाले क्षेत्रों की पहचान भी की जा रही है, ताकि वहां संचार व्यवस्था को बेहतर किया जा सके। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह प्रस्ताव व्यवहार में उतरता है या केवल एक रणनीतिक चर्चा बनकर रह जाता है।

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