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पंचायत चुनाव पर नया ट्विस्ट! हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी क्यों बढ़ रहा सस्पेंस?

राजस्थान पंचायत और नगर निकाय चुनाव को लेकर हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी सस्पेंस बरकरार है। सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है, जबकि कांग्रेस चुनाव टालने के आरोप लगा रही है। जानिए पूरा मामला।

राजस्थान पंचायत चुनाव

राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर सियासी माहौल अचानक गर्म हो गया है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को तय समय सीमा के भीतर चुनाव कराने का स्पष्ट निर्देश दिया है, लेकिन इसके बावजूद चुनाव को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है। सरकार के रुख से यह संकेत मिल रहे हैं कि मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष लगातार सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि वह किसी भी वर्ग के अधिकारों से समझौता नहीं करेगी। पंचायत और नगर निकायों का कार्यकाल खत्म हुए कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक जनता को नए जनप्रतिनिधि नहीं मिल पाए हैं। इस वजह से प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह प्रशासकों के भरोसे चल रही है।

हाई कोर्ट ने तय की समय सीमा

राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर बेंच ने हाल ही में बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को 31 जुलाई तक हर हाल में पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को लेकर देरी स्वीकार नहीं की जाएगी और आयोग को 20 जून तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में लंबे समय तक प्रशासकों के जरिए काम कराना उचित नहीं माना जा सकता। हालांकि सरकार का कहना है कि ओबीसी आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया पूरी किए बिना चुनाव कराना जल्दबाजी होगी। सूत्रों की मानें तो सरकार इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में राहत मांग सकती है कि आयोग को रिपोर्ट तैयार करने के लिए और समय चाहिए। यही वजह है कि चुनाव की तारीखों को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।

 सरकार पर चुनाव से बचने के आरोप

चुनाव में हो रही देरी को लेकर कांग्रेस लगातार राज्य सरकार को निशाने पर ले रही है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सरकार जानबूझकर चुनाव टालना चाहती है, क्योंकि उसे जनता के बीच अपनी स्थिति कमजोर नजर आ रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा कि सरकार लोकतंत्र की मूल भावना को कमजोर कर रही है। उनका कहना है कि पंचायत और नगर निकाय जनता से सीधे जुड़े संस्थान होते हैं और लंबे समय तक चुनाव न होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक संकेत नहीं है। कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि जनता विकास कार्यों में देरी और प्रशासनिक अव्यवस्था से परेशान है। विपक्ष का यह भी आरोप है कि सरकार हार के डर से चुनाव से बच रही है। कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे को लगातार जनता के बीच उठाती रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है मामला

सरकार के संभावित सुप्रीम कोर्ट जाने की चर्चा के बीच याचिकाकर्ताओं ने भी अपनी कानूनी तैयारी शुरू कर दी है। मामले से जुड़े अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि सरकार हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देती है तो वे सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखेंगे। उनका तर्क है कि समय पर चुनाव कराना लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है और इसे लंबे समय तक टालना संविधान की भावना के खिलाफ माना जा सकता है। दूसरी ओर राज्य सरकार के मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा है कि सरकार चुनाव कराने के पक्ष में है, लेकिन वह आरक्षण प्रक्रिया में किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होने देना चाहती। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मामला राजस्थान की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। यदि चुनाव फिर टलते हैं तो विपक्ष इसे बड़ा चुनावी हथियार बना सकता है, जबकि सरकार कानूनी और सामाजिक संतुलन का हवाला देकर अपने फैसले को सही ठहराने की कोशिश करेगी।

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