पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में हुई जबरदस्त वोटिंग अब सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि कानूनी चर्चा का भी विषय बन गई है। देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 92 प्रतिशत से ज्यादा मतदान पर खुशी जताते हुए कहा कि एक नागरिक के रूप में लोगों को बड़ी संख्या में वोट करते देखना अच्छा लगता है। उन्होंने इसे लोकतंत्र की मजबूती का संकेत बताया। यह टिप्पणी उस समय आई जब सुप्रीम कोर्ट में उन लोगों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिनके नाम कथित रूप से वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं और मामला अभी अपीलेट ट्रिब्यूनल में लंबित है। इस बयान के बाद चुनावी माहौल को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
कम हुई हिंसा, सुरक्षा व्यवस्था पर उठी सराहना
सुनवाई के दौरान अदालत में यह भी बताया गया कि इस बार चुनाव के दौरान हिंसा की घटनाएं काफी कम देखने को मिली हैं। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी संतोष जताया और कहा कि हालात पहले से बेहतर हैं। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुरक्षा बलों की मजबूत तैनाती और उनकी सक्रियता ने लोगों में भरोसा बढ़ाया है, जिसकी वजह से ज्यादा लोग मतदान के लिए बाहर निकले। उनका कहना था कि जब मतदाता खुद को सुरक्षित महसूस करता है, तभी वह खुलकर अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है।
TMC ने दी दलील
हालांकि, इस बंपर वोटिंग को लेकर एक अलग तर्क भी सामने आया। तृणमूल कांग्रेस की ओर से पक्ष रख रही वरिष्ठ वकील कल्याणी बनर्जी ने कहा कि इस बार ज्यादा मतदान की एक वजह डर भी हो सकता है। उनका कहना था कि कई लोगों को यह आशंका थी कि उनका नाम वोटर लिस्ट से हट सकता है, इसलिए प्रवासी मजदूर समेत बड़ी संख्या में लोग वोट डालने पहुंचे। इस दलील पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उन्हें टोका और कहा कि अदालत में राजनीतिक बातें नहीं करनी चाहिए। इस बयान के बाद कोर्ट रूम का माहौल कुछ देर के लिए गर्म हो गया।
वोटर लिस्ट विवाद
इस पूरे मामले की जड़ उन 71 लोगों की याचिका है, जिनका दावा है कि उनका नाम एसआईआर प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। फिलहाल उनका मामला अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास लंबित है और सुप्रीम कोर्ट इस पर नजर बनाए हुए है। चुनाव के बीच इस तरह का विवाद चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल भी खड़े करता है, लेकिन साथ ही भारी मतदान यह भी दिखाता है कि लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा कायम है। अब देखना होगा कि कोर्ट इस मामले में क्या फैसला देता है और क्या इसका असर आगे के चुनावी चरणों पर पड़ता है।
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