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टीवी दर्शकों के लिए बड़ी खुशखबरी! दिल्ली हाई कोर्ट के इस एक फैसले से बदल जाएगा आपका टीवी देखने का अंदाज, चैनलों को लगा बड़ा झटका

टीवी देखने वालों के लिए दिल्ली हाई कोर्ट से आई बड़ी खुशखबरी! अब टीवी चैनल मनमाने विज्ञापन नहीं दिखा सकेंगे। जानें क्या है कोर्ट का नया आदेश और 12 मिनट का पूरा गणित।

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टीवी स्क्रीन पर पसंदीदा शो या जरूरी समाचार देखते समय लगातार आने वाले लंबे-लंबे विज्ञापनों से परेशान जनता के लिए देश की अदालत से एक बेहद राहत भरी खबर आई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने टेलीविजन प्रेमियों के हक में एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो आपके टीवी देखने के अनुभव को पूरी तरह से बदलने वाला है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी टीवी चैनल अपनी मनमर्जी से दर्शकों पर विज्ञापनों की बौछार नहीं कर सकेगा। कोर्ट ने टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी ‘ट्राई’ (TRAI) के उस पुराने नियम पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसके तहत टीवी चैनलों के लिए विज्ञापन दिखाने की एक सख्त समय सीमा तय की गई थी। इस फैसले के बाद अब किसी भी चैनल पर प्रति घंटा विज्ञापनों का खेल सीमित हो जाएगा।

जानिए क्या है कोर्ट का आदेश और विज्ञापनों की नई समय सीमा

दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन शामिल थे, ने मामले की गंभीरता को समझते हुए ट्राई के नियम को बिल्कुल सही ठहराया है। कोर्ट के नए आदेश के मुताबिक, अब कोई भी टीवी चैनल एक घंटे के प्रसारण के दौरान 12 मिनट से ज्यादा का विज्ञापन नहीं दिखा सकता है। नियमों की बारीकियों को समझें तो इस 12 मिनट की समय सीमा में भी एक खास वर्गीकरण किया गया है। चैनलों को हर एक घंटे में अधिकतम 10 मिनट के कमर्शियल (व्यावसायिक) विज्ञापन और केवल 2 मिनट का सेल्फ-प्रोमोनल कंटेंट (यानी अपने ही चैनल के अन्य शो का प्रचार) दिखाने की इजाजत होगी। अदालत ने ब्रॉडकास्टर्स और टीवी चैनलों द्वारा दायर की गई सभी आपत्तियों और याचिकाओं को सिरे से खारिज करते हुए साफ किया कि नियामक संस्था ने यह नियम अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर और आम जनता की भलाई के लिए बनाया है।

कमाई और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर चैनलों ने दी थी यह दलील


अदालत के इस फैसले से पहले टीवी इंडस्ट्री के बड़े दिग्गजों, मनोरंजन चैनलों, न्यूज नेटवर्क्स और क्षेत्रीय भाषा के ब्रॉडकास्टर्स ने कोर्ट में इसके खिलाफ अपनी पुरजोर आवाज उठाई थी। चैनलों का तर्क था कि विज्ञापन ही उनकी कमाई का सबसे मुख्य जरिया हैं। अगर विज्ञापनों के समय पर इस तरह की पाबंदी लगाई जाएगी, तो उनके कारोबार को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। खासकर ‘फ्री-टू-एयर’ (मुफ्त दिखने वाले) और छोटे क्षेत्रीय चैनलों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। इसके अलावा, न्यूज चैनलों ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला देते हुए यह दलील भी दी थी कि व्यावसायिक भाषण (कमर्शियल स्पीच) भी अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है और इस पर रोक लगाना उनके अधिकारों का हनन है।

दर्शकों का हित सर्वोपरि, 10 साल पुरानी कानूनी लड़ाई का हुआ अंत


चैनलों की तमाम दलीलों को खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि टेलीविजन देखने वाले दर्शकों का हित और उनका अनुभव किसी भी व्यवसाय से ऊपर है। कोर्ट ने माना कि टीवी देखने वाले लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म की तरह रियल टाइम में विज्ञापनों को ‘स्किप’ (हटा) नहीं सकते, इसलिए जरूरत से ज्यादा विज्ञापन उनके टीवी देखने के मजे को किरकिरा करते हैं। यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि यह चैनलों के व्यापार और दर्शकों के अधिकारों के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाता है। आपको बता दें कि यह कानूनी लड़ाई पिछले एक दशक (साल 2013) से अदालत में चल रही थी, जिस पर अब जाकर कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाते हुए ट्राई के नियमों को पूरी तरह वैध घोषित कर दिया है।

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