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मोदी सरकार के दो मंत्री आमने-सामने, आरक्षण पर चिराग-मांझी की लड़ाई आखिर क्यों पहुंची इस्तीफे तक?

चिराग पासवान और जीतन राम मांझी SC आरक्षण में उप-श्रेणी और क्रीमी लेयर के मुद्दे पर आमने-सामने हैं। जानिए दोनों नेताओं के विरोध की वजह और बिहार का जातीय समीकरण।

मोदी सरकार

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में शामिल दो मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी इन दिनों अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण को लेकर आमने-सामने हैं। दोनों नेताओं के बीच मतभेद अब इतना बढ़ गया है कि एक-दूसरे के इस्तीफे की मांग तक सामने आ गई है। विवाद की शुरुआत SC आरक्षण में उप-श्रेणी और क्रीमी लेयर को लेकर हुई। जीतन राम मांझी का मानना है कि आरक्षण का लाभ उन दलित समुदायों तक भी प्रभावी तरीके से पहुंचना चाहिए जो अभी ज्यादा पिछड़े हुए हैं। वहीं चिराग पासवान इसका विरोध करते हुए कहते हैं कि SC समाज के भीतर अलग-अलग कोटा बनाने से सामाजिक एकता प्रभावित हो सकती है। दोनों नेताओं की यह बहस बिहार की राजनीति के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सरकारी नौकरियों के आंकड़े क्यों बने बहस की वजह?

इस विवाद के पीछे बिहार के जातिगत सर्वे से जुड़े सरकारी नौकरी के आंकड़ों को भी एक बड़ा आधार माना जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में करीब 2.91 लाख SC लोगों के पास सरकारी नौकरी है। इनमें दुसाध समुदाय के करीब 99,230, राम समुदाय के करीब 82,290 और मुसहर समुदाय के करीब 10,615 लोग बताए गए हैं। आंकड़ों में धोबी, पासी और डोम जैसे अन्य समुदाय भी शामिल हैं। इन्हीं आंकड़ों का हवाला देकर मांझी का तर्क है कि सभी दलित जातियों को आरक्षण का फायदा बराबर नहीं मिल पाया है। उनका कहना है कि जो समुदाय सबसे ज्यादा पीछे हैं, उनके लिए व्यवस्था में बदलाव पर विचार किया जाना चाहिए।

चिराग और मांझी के तर्क क्यों हैं अलग?

चिराग पासवान का विरोध मुख्य रूप से SC आरक्षण में क्रीमी लेयर और उप-श्रेणी की अवधारणा को लेकर है। उनका कहना है कि अनुसूचित जातियों को आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव के आधार पर मिला है और इसे आर्थिक आधार से जोड़ना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर मांझी मानते हैं कि यदि आरक्षण का लाभ कुछ ही समुदायों तक ज्यादा पहुंच रहा है तो सबसे कमजोर जातियों को उनका उचित हिस्सा दिलाने के लिए समीक्षा जरूरी है। बिहार के आंकड़ों में मुसहर समुदाय की सरकारी नौकरियों में संख्या काफी कम बताई जाती है। यही मुद्दा मांझी के तर्क को मजबूत करता है। दूसरी तरफ चिराग का सामाजिक आधार पासवान समुदाय में मजबूत माना जाता है, इसलिए आरक्षण में बदलाव का सवाल उनके लिए भी बेहद संवेदनशील है।

बिहार के जातीय समीकरण से जुड़ी है पूरी लड़ाई

चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों दलित राजनीति के प्रमुख चेहरे हैं, लेकिन दोनों का सामाजिक आधार अलग है। बिहार में पासवान समुदाय की आबादी और राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण है, जबकि मांझी मुसहर समुदाय के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। यही वजह है कि आरक्षण पर दोनों के विचारों में राजनीतिक अंतर भी दिखाई दे रहा है। चिराग SC समाज को एकजुट रखने की बात कर रहे हैं, जबकि मांझी आरक्षण का लाभ सबसे कमजोर दलित समुदायों तक पहुंचाने पर जोर दे रहे हैं। अब मामला सार्वजनिक तौर पर इस्तीफे की मांग तक पहुंच चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है और बिहार के राजनीतिक समीकरण पर इसका कितना असर पड़ता है।

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