राजस्थान की राजनीति एक बार फिर उस समय गरमा गई जब पूर्व मुख्यमंत्री Vasundhara Raje ने एक जनसभा के दौरान ऐसा बयान दे दिया, जिसने सियासी हलकों में हलचल मचा दी। 9 अप्रैल को मनोहर थाना में आयोजित जनसंवाद यात्रा के दौरान वे अपने बेटे और सांसद Dushyant Singh के साथ मंच पर मौजूद थीं। अपने भाषण में उन्होंने क्षेत्र के लोगों के आपसी संबंधों की सराहना करते हुए कहा कि समस्याएं तो जीवन का हिस्सा हैं—किसी का घर नहीं बनता, किसी को पेंशन नहीं मिलती, तो किसी को मुआवजा नहीं मिलता। लेकिन इन सबके बीच आपसी विश्वास और सहयोग जरूरी है। इसी दौरान उन्होंने एक लाइन कही—“मेरे साथ भी होता है भैया…”, जिसने पूरे बयान को खास बना दिया।
“मैं अपने लिए भी कुछ नहीं कर सकी…”—बयान का मतलब क्या?
अपने संबोधन में वसुंधरा राजे ने आगे कहा कि वे खुद भी कई बार अपने लिए कुछ नहीं कर पातीं और कई चीजें उनके हाथ से निकल जाती हैं। उनके इस बयान को लेकर अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह इशारा सत्ता से दूरी या मुख्यमंत्री पद न मिलने के दर्द की तरफ था। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी राजनीतिक मुद्दे का जिक्र नहीं किया, लेकिन उनकी बातों ने यह संकेत जरूर दिया कि राजनीति में सब कुछ हमेशा अपने नियंत्रण में नहीं होता। यही वजह है कि उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और चर्चा का विषय बन गया।
विपक्ष ने लिया मौका, बयान पर चढ़ी सियासत
इस बयान पर विपक्ष ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी। समाजवादी पार्टी के प्रमुख Akhilesh Yadav जब जयपुर पहुंचे तो उनसे इस बयान को लेकर सवाल पूछा गया। इस पर उन्होंने कहा कि अगर वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री होतीं तो राज्य में बेहतर काम होता, और “पर्ची वाले मुख्यमंत्री” किसी का भला नहीं कर सकते। वहीं, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री Ashok Gehlot ने भी इस मौके को नहीं छोड़ा और अखिलेश यादव की बातों से सहमति जताते हुए भाजपा के अंदरूनी हालात पर तंज कसा। इससे साफ है कि एक बयान ने सत्ताधारी दल के भीतर की संभावित खींचतान को भी उजागर कर दिया।
राजनीति में अब भी कायम है वसुंधरा का दबदबा
भले ही वसुंधरा राजे फिलहाल सत्ता के केंद्र में न हों, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव अब भी मजबूत माना जाता है। उनके हर बयान को गंभीरता से लिया जाता है और पार्टी के भीतर उनकी पकड़ भी किसी से छिपी नहीं है। यही कारण है कि उनका यह छोटा सा बयान भी बड़े राजनीतिक विमर्श में बदल गया। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बयान सिर्फ एक भावनात्मक टिप्पणी था या इसके पीछे कोई गहरी सियासी रणनीति छिपी है। फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे की अहमियत अभी भी बरकरार है।
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