अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिनों के सीजफायर को लेकर जहां एक तरफ तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ इस समझौते के पीछे किसकी भूमिका रही, इसे लेकर विवाद तेज हो गया है। पाकिस्तान खुद को इस शांति प्रयास का बड़ा सूत्रधार बता रहा है और लगातार इसका श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे देश की बड़ी कूटनीतिक सफलता बताते हुए कहा कि इस पहल से पाकिस्तान की वैश्विक छवि मजबूत हुई है। लेकिन इसी बीच इजरायल की ओर से आए बयान ने पूरे मामले में नया मोड़ ला दिया है, जिससे पाकिस्तान के दावों पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
इजरायल ने जताया अविश्वास, कहा—पाकिस्तान भरोसेमंद नहीं
भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि भले ही अमेरिका ने अपने रणनीतिक कारणों से पाकिस्तान की भूमिका को स्वीकार किया हो, लेकिन इजरायल को इस पर भरोसा नहीं है। अजार ने यह भी याद दिलाया कि पहले भी अमेरिका ने कतर और तुर्की जैसे देशों के जरिए बातचीत करवाई है, लेकिन इससे हमेशा सकारात्मक नतीजे नहीं निकले। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि इजरायल इस पूरे सीजफायर प्रक्रिया को लेकर सतर्क है और पाकिस्तान की भूमिका को संदेह की नजर से देख रहा है।
पाकिस्तान का पलटवार—‘हम बने ग्लोबल मध्यस्थ’
इजरायल के इस कड़े रुख के बावजूद पाकिस्तान अपनी बात पर कायम है। विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान दोनों ने पाकिस्तान पर भरोसा जताया है और इसी वजह से यह सीजफायर संभव हो पाया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक समझौता नहीं, बल्कि पाकिस्तान के लिए एक नई कूटनीतिक पहचान की शुरुआत है। आसिफ के मुताबिक, इस पहल के बाद पाकिस्तान को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर एक प्रभावशाली मध्यस्थ के रूप में देखा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस कदम से मध्य पूर्व में स्थिरता और शांति की उम्मीद बढ़ी है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दावे को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
कूटनीति या रणनीति? दुनिया देख रही असली ताकत का खेल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में एक मजबूत मध्यस्थ के रूप में उभर रहा है या फिर वह केवल बड़े देशों की रणनीति का हिस्सा बनकर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अक्सर अपने हितों के अनुसार अलग-अलग देशों का इस्तेमाल करता है और पाकिस्तान की भूमिका भी उसी कड़ी का हिस्सा हो सकती है। वहीं इजरायल का कड़ा रुख इस बात का संकेत है कि वह किसी भी ऐसे देश पर भरोसा करने को तैयार नहीं है, जिसकी भूमिका स्पष्ट न हो। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह सीजफायर कितना प्रभावी साबित होता है और पाकिस्तान की असली भूमिका क्या सामने आती है।
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