पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक नई जानकारी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को और गर्मा दिया है। हाल ही में ईरान द्वारा दागी गई मिसाइलों के मलबे की जांच में ऐसे संकेत मिले हैं कि इनके निर्माण में रूसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया हो सकता है। शुरुआती विश्लेषण में यह पाया गया कि मिसाइलों के कुछ हिस्सों की बनावट और तकनीकी ढांचा उन प्रणालियों से मिलता-जुलता है जो पहले सोवियत दौर में विकसित की गई थीं। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि ईरान ने अपनी मिसाइल क्षमताओं को मजबूत करने के लिए बाहरी तकनीकी सहयोग लिया होगा। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी देश ने अभी तक इस सहयोग की पुष्टि नहीं की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह खुलासा पश्चिम एशिया की जंग को और जटिल बना सकता है। इस पूरे मामले में रूस की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं।
रूस और ईरान के रिश्तों पर फिर उठे सवाल
विश्लेषकों का मानना है कि अगर जांच में सामने आए संकेत सही साबित होते हैं, तो इसका मतलब यह होगा कि ईरान की सैन्य तकनीक पूरी तरह घरेलू नहीं है। माना जा रहा है कि मिसाइलों के डिजाइन और निर्माण में पुराने सोवियत दौर की तकनीक या विशेषज्ञों की जानकारी का इस्तेमाल किया गया होगा। इसी कारण कई देशों ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। इस बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष के पीछे बड़े देशों की रणनीतिक भूमिका हो सकती है। हालांकि Russia ने अब तक इन आरोपों पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं Iran भी अपने रक्षा कार्यक्रम को पूरी तरह स्वतंत्र बताता रहा है। लेकिन मौजूदा हालात में दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग की संभावनाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
ट्रंप का बड़ा दावा, युद्ध खत्म करने की बात
इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने इस संघर्ष को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। एक फोन बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ईरान के साथ चल रहा यह युद्ध जब चाहें तब खत्म किया जा सकता है। ट्रंप के अनुसार हालात ऐसे हैं कि ईरान में अब निशाना बनाने के लिए बहुत कम रणनीतिक लक्ष्य बचे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो यह संघर्ष जल्दी समाप्त हो सकता है। हालांकि ट्रंप के इस बयान के बावजूद क्षेत्र में हमले और जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी है। दूसरी ओर Israel ने साफ कर दिया है कि वह अपने सैन्य अभियान को तब तक जारी रखेगा जब तक उसके सभी रणनीतिक लक्ष्य पूरे नहीं हो जाते। इजरायल का कहना है कि इस अभियान की कोई तय समय सीमा नहीं है और जरूरत पड़ने पर इसे लंबे समय तक जारी रखा जा सकता है।
संघर्ष का असर भारत की ऊर्जा रणनीति पर भी
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। इस स्थिति को देखते हुए भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए रणनीति में बदलाव करना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ने मार्च महीने में रूस से कच्चे तेल की खरीद में करीब पचास प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है। जहाज निगरानी से जुड़े आंकड़ों के अनुसार इस समय भारत रोजाना लगभग पंद्रह लाख बैरल रूसी तेल खरीद रहा है। इससे पहले फरवरी में यह मात्रा करीब दस लाख बैरल प्रतिदिन के आसपास थी। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयात करने वाला देश है और अपनी कुल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीद बढ़ाकर संभावित आपूर्ति संकट से बचने की कोशिश कर रहा है।
