बच्चों की किलकारियां, पति का साथ, सामाजिक रूप से सुरक्षित जीवन… बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य और खुशहाल लगता है, लेकिन इन्हीं घरों के भीतर कई महिलाएं गहरे खालीपन से गुजर रही हैं। जिले में बीते कुछ समय से सामने आए मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है, जो महिलाएं अपने पति और मासूम बच्चों को छोड़कर घर की दहलीज लांघने को मजबूर हो रही हैं। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि साल 2025 में कम से कम 57 विवाहित महिलाएं अपने प्रेमी के साथ फरार हो गईं, जिनके पीछे 81 बच्चे रह गए। ये सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि उन परिवारों की हकीकत हैं जहां अचानक मां की ममता और घर का सहारा छिन गया। कई मामलों में महिलाएं किसी विद्रोह या गुस्से में नहीं, बल्कि उस जीवन की तलाश में घर छोड़ती दिखीं, जिसमें उन्हें भावनात्मक अपनापन और समझ मिलने का अहसास हुआ।
इंटरनेट मीडिया से शुरू हुआ रिश्ता, परिवार पीछे छूटा
जांच में सामने आया है कि अधिकांश मामलों की शुरुआत मोबाइल फोन और इंटरनेट मीडिया से हुई। पहले सामान्य बातचीत, फिर देर रात के संदेश, और धीरे-धीरे भावनात्मक जुड़ाव इतना गहरा हो गया कि पारिवारिक जिम्मेदारियां पीछे छूटती चली गईं। 20 से 50 वर्ष तक की महिलाएं इन मामलों में शामिल हैं, जिससे साफ है कि यह समस्या किसी एक उम्र तक सीमित नहीं है। कुछ महिलाएं युवा थीं, तो कुछ ऐसी भी थीं जिनकी शादी को 15-20 साल हो चुके थे। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में समय रहते कार्रवाई कर महिलाओं को खोजकर परिवार के पास लौटा दिया गया, लेकिन इसके बावजूद 57 महिलाएं अपने फैसले पर अडिग रहीं। इन फैसलों का सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ा है, जिन्हें अचानक मां के सान्निध्य से दूर होना पड़ा। कई पिता अब अकेले बच्चों की परवरिश कर रहे हैं, तो कुछ मामलों में दादा-दादी या रिश्तेदारों को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ी है।
पहचान, संवाद और भावनात्मक असुरक्षा की लड़ाई
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल नैतिक या पारिवारिक संकट नहीं, बल्कि गहरी मानसिक और सामाजिक समस्या है। मंडलीय मनोवैज्ञानिक डॉ. रीना तोमर के अनुसार, कई महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में संवाद की कमी, उपेक्षा, भावनात्मक असुरक्षा और पहचान के संकट से जूझ रही होती हैं। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उनकी भावनाओं को समझने वाला कोई नहीं होता। ऐसे में जब बाहर से कोई व्यक्ति उन्हें ध्यान देता है, उनकी बात सुनता है और भावनात्मक स्वीकृति देता है, तो वे खुद को महत्वपूर्ण महसूस करने लगती हैं। इंटरनेट मीडिया इस जुड़ाव को और तेज कर देता है, जहां भावनाएं बिना रोक-टोक गहराती चली जाती हैं। परिणामस्वरूप महिलाएं बिना भविष्य के नतीजों पर विचार किए बड़े फैसले ले लेती हैं, जिनका असर सिर्फ उनके जीवन पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार और बच्चों पर पड़ता है।
टूटते रिश्ते और बच्चों पर पड़ता गहरा असर
इन घटनाओं ने समाज के सामने एक गंभीर चेतावनी रखी है। मां के बिना बच्चों का मानसिक विकास, पारिवारिक संतुलन और सामाजिक सुरक्षा सब प्रभावित होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते परिवारों में संवाद बढ़ाया जाए, महिलाओं की भावनात्मक जरूरतों को समझा जाए और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग की मदद ली जाए, तो कई टूटते रिश्तों को बचाया जा सकता है। यह समय केवल महिलाओं पर सवाल उठाने का नहीं, बल्कि पूरे पारिवारिक ढांचे पर आत्ममंथन करने का है। बदलती सामाजिक सोच, भागदौड़ भरी जिंदगी और डिजिटल दुनिया ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी है। अगर इस सच्चाई को नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले समय में ऐसे मामलों की संख्या और बढ़ सकती है, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा मासूम बच्चों और समाज को भुगतना पड़ेगा।
Read More-ताजमहल देखने आए थे सैलानी, मंदिर में बन गए पति-पत्नी! फ्रांस के बुज़ुर्ग जोड़े ने रचाई हिंदू शादी