Saturday, December 4, 2021

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित मामले पर दिया बड़ा फैसला, विवाहिता पुत्री पर कही ये बात

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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित के लिए बड़ा फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने फैसले में कहा है कि विवाहिता पुत्री मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने की हकदार नहीं हैं। कोर्ट ने हकदार नहीं होने का कारण भी बताया है। कोर्ट ने कहा है कि प्रथम शिक्षण संस्थाओं के लिए बने रेग्यूलेशन 1995 के तहत विवाहिता पुत्री परिवार में शामिल नहीं है। द्वितीय आश्रित कोटे में नियुक्ति की मांग अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती। याची ने छिपाया कि उसकी मां को पारिवारिक पेंशन मिल रही है। वह याची पर आश्रित नहीं है और तीसरे कानून एवं परंपरा दोनों के अनुसार विवाहिता पुत्री अपने पति की आश्रित होती है, पिता की नहीं। जब विवाहिता पति पर आश्रित है तो पिता के आश्रित होने का लाभ नहीं मिलेगा। कोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए एकलपीठ के विवाहिता पुत्री को आश्रित कोटे में नियुक्ति देने के आदेश 9 अगस्त 2021 को रद कर दिया। विवाहिता पुत्री को अनुकम्पा, आश्रित मिलने वाली सहायता नहीं मिलेगी।

यह फैसला एक्टिंग चीफ जस्टिस एमएन भंडारी और जस्टिस विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने दिया। माधवी मिश्रा ने विवाहिता पुत्री के तौर पर विमला श्रीवास्तव केस के आधार पर मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति की मांग की थी। याची के पिता इंटर कॉलेज में तदर्थ प्रधानाचार्य पद पर कार्यरत थे। सेवाकाल में उनकी मृत्यु हो गई। सेवा काल में मृत्यु होने पर आश्रित बता कर सहायता मांगी गयी थी। राज्य सरकार की अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता सुभाष राठी का कहना था कि मृतक आश्रित विनियमावली 1995, साधारण खंड अधिनियम 1904, इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम व 30 जुलाई 1992के शासनादेश के तहत विधवा, विधुर, पुत्र, अविवाहित या विधवा पुत्री को आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने का हकदार माना गया है।

याची के वकील ने कही ये बात

राठी ने कहा कि 1974 की मृतक आश्रित सेवा नियमावली कॉलेज की नियुक्ति पर लागू नहीं होती है। एकलपीठ ने गलत ढंग से इसके आधार पर नियुक्ति का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि वैसे भी सामान्य श्रेणी का पद खाली नहीं है। मृतक की मां विधवा पेंशन पा रही है। जिला विद्यालय निरीक्षक शाहजहांपुर ने नियुक्ति से इनकार कर गलती नहीं की है। याची अधिवक्ता सीमांत सिंह का कहना था कि सरकार ने कल्याणकारी नीति अपनाई है। विमला श्रीवास्तव केस में कोर्ट ने पुत्र-पुत्री में विवाहित होने के आधार पर भेद करने को असंवैधानिक करार दिया है और नियमावली के अविवाहित शब्द को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आश्रित की नियुक्ति का नियम जीविकोपार्जन करने वाले की अचानक मौत से उत्पन्न आर्थिक संकट में मदद के लिए की जाती है। अनुग्रह, अनुकम्पा अधिकार नहीं है, बल्कि इसे मदद, सहायता के रूप् में देखा जाना चाहिए। मान्यता प्राप्त एडेड कालेजों के आश्रित कोटे में नियुक्ति की अलग नियमावली है तो सरकारी सेवकों की 1994 की नियमावली इसमें लागू नहीं होगी।

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