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14416 पर एक कॉल… और बदल गई ज़िंदगी! यूपी में कैसे खामोशी से क्रांति बन गया ‘टेली-मानस’?

यूपी में टेली-मानस हेल्पलाइन, ‘अस्मी’ एआई चैटबॉट और परीक्षा हेल्पलाइन 2026 कैसे बन रही हैं मानसिक स्वास्थ्य की नई उम्मीद? पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य नीति का चेहरा अब तेजी से बदल रहा है। कभी जिस मानसिक स्वास्थ्य को लोग नजरअंदाज करते थे, आज वही सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। ‘विकसित यूपी @2047’ के विज़न के तहत योगी सरकार ने यह साफ कर दिया है कि शारीरिक बीमारी जितनी ही गंभीर मानसिक परेशानी भी है। इसी सोच के साथ राज्य में ऐसी व्यवस्थाएं खड़ी की गईं, जिनसे गांव, कस्बे और शहर—हर जगह का नागरिक बिना झिझक मदद मांग सके। सरकार का फोकस केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, शुरुआती पहचान और समय पर परामर्श को भी मजबूती दी जा रही है। इसका नतीजा यह हुआ कि अब लोग डिप्रेशन, एंग्जायटी, तनाव या अकेलेपन की समस्या को खुलकर साझा करने लगे हैं। यह बदलाव अपने आप में एक बड़ी सामाजिक क्रांति माना जा रहा है।

टेली-मानस और ‘अस्मी’—तकनीक बनी सहारा

उत्तर प्रदेश में टेली-मानस हेल्पलाइन (14416) आज हजारों लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन चुकी है। यह सेवा 24×7 उपलब्ध है, जहां प्रशिक्षित काउंसलर कॉल पर ही मानसिक उलझनों को सुनते और समाधान सुझाते हैं। हाल ही में वीडियो कंसल्टेशन की सुविधा जुड़ने से यह सेवा और प्रभावी हो गई है। वहीं युवाओं और छात्रों को ध्यान में रखते हुए शुरू किया गया ‘अस्मी’ एआई चैटबॉट एक नया प्रयोग है। यह चैटबॉट स्थानीय भाषा में बातचीत कर तुरंत प्राथमिक सलाह देता है, जिससे पहली बार मदद लेने वाले लोगों की झिझक कम होती है। आंकड़े बताते हैं कि टेली-मानस पर आने वाली कॉल्स के मामले में यूपी देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक और संवेदनशीलता का यह मेल मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आम आदमी तक पहुंचाने में मील का पत्थर साबित हो रहा है।

परीक्षा तनाव से गांव की काउंसलिंग तक

जनवरी 2026 में यूपी बोर्ड परीक्षाओं से पहले शुरू की गई ‘परीक्षा हेल्पलाइन 2026’ ने लाखों छात्रों को बड़ी राहत दी। परीक्षा के दबाव, डर और असफलता की चिंता से जूझ रहे छात्रों को विशेषज्ञ काउंसलरों से सीधा संवाद करने का मौका मिला। प्रयागराज मुख्यालय के साथ-साथ मेरठ, बरेली, वाराणसी और गोरखपुर में क्षेत्रीय केंद्र बनाए गए, ताकि स्थानीय स्तर पर भी मदद मिल सके। दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अनिवार्य पैकेज के रूप में शामिल किया गया। अब 25 हजार से ज्यादा स्वास्थ्य उप-केंद्रों पर काउंसलिंग, शुरुआती जांच और जरूरत पड़ने पर रेफरल की सुविधा उपलब्ध है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में इन-पेशेंट वार्ड और डॉक्टरों को दिया जा रहा विशेष प्रशिक्षण इस बात का संकेत है कि सरकार गांव में ही समाधान देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

शिक्षा, पुनर्वास और भविष्य की तैयारी

राज्य के विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में बनाए जा रहे ‘हैप्पीनेस ज़ोन’ और ‘मेंटल वेलनेस सेंटर’ मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास हैं। शिक्षकों को ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि वे छात्रों में डिप्रेशन या एंग्जायटी के शुरुआती संकेत पहचान सकें। इसके साथ ही दिव्यांगजन और मानसिक बीमारियों से उबर रहे लोगों के पुनर्वास पर भी जोर दिया जा रहा है। डे-केयर सेंटर, कौशल विकास कार्यक्रम और स्वैच्छिक संस्थाओं की भागीदारी से ऐसे लोगों को दोबारा समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल आने वाले वर्षों में अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में मानसिक स्वास्थ्य अब केवल इलाज नहीं, बल्कि सम्मान, समझ और संवेदना से जुड़ा विषय बन चुका है—और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।

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