उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में पुलिस ने एक ऐसी कार्रवाई को अंजाम दिया है, जिसकी चर्चा पूरे प्रदेश में हो रही है। कानपुर के रेउना थाना क्षेत्र का एक छोटा सा गांव, जो कभी अपनी सादगी के लिए जाना जाता था, धीरे-धीरे अपराध का गढ़ बन चुका था। यहाँ के शातिर ठग झारखंड के ‘जामतारा’ की तर्ज पर देशभर के लोगों को अपना शिकार बना रहे थे। जब पुलिस को इस ‘डिजिटल डकैती’ की भनक लगी, तो एडीसीपी आईपीएस सुमित सुधाकर रामटेके के नेतृत्व में एक अभेद्य चक्रव्यूह रचा गया। यह कोई साधारण छापेमारी नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ थी, जिसमें तकनीक और पुलिसिया कौशल का ऐसा मेल दिखा कि अपराधी चाहकर भी बच नहीं सके।
फिल्मी स्टाइल में घेराबंदी
कानपुर मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में जब अचानक पुलिस की गाड़ियों का काफिला सायरन बजाते हुए दाखिल हुआ, तो ग्रामीणों के बीच हड़कंप मच गया। पुलिस ने सबसे पहले गांव की पगडंडियों और गुप्त रास्तों को सील कर दिया ताकि कोई भी परिंदा पर न मार सके। इस ऑपरेशन की सबसे खास बात थी आसमान में मंडराते दर्जनों ड्रोन। जैसे ही पुलिस ने लाउडस्पीकर से आत्मसमर्पण की चेतावनी दी, शातिर ठगों ने खेतों और संकरी गलियों के रास्ते भागने की कोशिश की। उन्हें लगा कि वे झाड़ियों में छिप जाएंगे, लेकिन वे भूल गए थे कि ऊपर उड़ रहे ड्रोनों की ‘डिजिटल आंखें’ उनकी हर हरकत को लाइव रिकॉर्ड कर रही थीं। ड्रोन ने भागते हुए ठगों की लोकेशन पुलिस टीम को दी और फिर शुरू हुआ ‘दौड़ा-दौड़ी’ का वह मंजर, जैसा अक्सर सिनेमा के पर्दे पर दिखता है।
वृद्धावस्था पेंशन और सम्मान निधि के नाम पर लूट
पकड़े गए 19 ठगों से जब शुरुआती पूछताछ हुई, तो उनके काम करने के तरीके ने पुलिस को भी हैरान कर दिया। ये अपराधी किसी अनपढ़ गिरोह का हिस्सा नहीं थे, बल्कि बहुत ही संगठित तरीके से सरकारी डेटा का इस्तेमाल कर रहे थे। ये ठग वृद्धावस्था पेंशन, किसान सम्मान निधि और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं का डेटा अवैध रूप से हासिल करते थे। इसके बाद, ये उन भोले-भाले ग्रामीणों और बुजुर्गों को कॉल करते थे, जिन्हें तकनीक की कम समझ होती है। बैंक अधिकारी बनकर ये उनके खाते की जानकारी जुटाते और पलक झपकते ही उनकी जीवन भर की कमाई साफ कर देते थे। पुलिस को मौके से भारी मात्रा में मोबाइल फोन, सिम कार्ड और कई म्यूल अकाउंट्स (फर्जी बैंक खाते) के दस्तावेज बरामद हुए हैं।
पूरा गांव बना था ठगी का अड्डा
जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इस गांव का एक बड़ा हिस्सा एक संगठित गिरोह की तरह काम कर रहा था। जैसे झारखंड के जामतारा में घर-घर से साइबर ठगी का संचालन होता है, वैसा ही कुछ यहाँ भी विकसित हो रहा था। यहाँ का हर दूसरा शख्स या तो ठगी में शामिल था या फिर अपराधियों को पनाह देने में मदद कर रहा था। एडीसीपी रामटेके के अनुसार, इन ठगों ने अपने नेटवर्क को न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि अन्य राज्यों तक फैला रखा था। ये म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल पैसे को इधर-बदल करने के लिए करते थे, ताकि पुलिस की पकड़ में न आ सकें। इस छापेमारी ने यह साबित कर दिया है कि अब अपराधी चाहे जितना डिजिटल हो जाएं, कानून के हाथ उन तक पहुँच ही जाएंगे।
करोड़ों की ठगी के राज खुलने की उम्मीद
पुलिस को विश्वास है कि इन 19 आरोपियों की गिरफ्तारी तो महज एक शुरुआत है। इनसे होने वाली सघन पूछताछ के बाद कई अंतर्राज्यीय राज खुल सकते हैं और करोड़ों रुपये की ठगी का हिसाब सामने आ सकता है। इस ‘ड्रोन ऑपरेशन’ ने न केवल अपराधियों के मन में खौफ पैदा किया है, बल्कि आम जनता को भी एक कड़ा संदेश दिया है कि साइबर अपराध के खिलाफ प्रशासन अब ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर चल रहा है। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी अनजान कॉल पर अपनी बैंकिंग जानकारी साझा न करें। फिलहाल, रेउना के उस गांव में पुलिस का पहरा सख्त है और पकड़े गए आरोपियों के बैंक खातों को खंगाला जा रहा है ताकि पीड़ितों का पैसा वापस दिलाया जा सके।
Read more-रिश्तों की मर्यादा भुला साला: 5 करोड़ की रंगदारी के लिए जीजा को बनाया शिकार, रची खौफनाक साजिश