आस्था का केन्द्र यहीं वो मंदिर है जिसे विश्वकर्मा ने एक ही रात में बनवाया था

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औरंगाबाद। विरासतों और ऐतिहासिक धरोहरों का देश भारत है। यहां गांव-गांव में सभ्यता, संस्कृति की अनमोल धरोहर देखती जा सकती है। बिहार के औरंगाबाद जिले में देव स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर कई मामलों में अनोखा है। माना जाता है इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने एक ही रात में की थी। यह देश का इकलौता ऐसा सूर्य मंदिर है जिसका दरवाजा पश्चिम की ओर है। इस मंदिर में सूर्य देवता की मूर्ति सात रथों पर सवार है। इसमें सूर्य तीनों रूपों उदयाचल, प्रातः सूर्य, मध्याचल मध्य सूर्य और अस्ताचल अस्त सूर्य के रूप में विद्यमान है। देश में यही एकमात्र सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है। सूर्य मंदिर होने के कारण छठ व्रतियों के लिए आस्था का केन्द्र है। लाखों श्रद्धालु छठ करने झारखंड, मध्य प्रदेश, उतर प्रदेश समेत कई राज्यों से आते हैं। माना जाता है कि जो भक्त मन से इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करते हैं। उनकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। मान्यता है कि इस सूर्य मंदिर का निर्माण डेढ़ लाख वर्ष पूर्व किया गया था। त्रेता युगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मक भव्यता के साथ-साथ अपने इतिहास के लिए भी विख्यात है। यह मंदिर औरंगाबाद से 18 किलोमीटर दूर देव में स्थित है।

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इस मंदिर के पीछे एक कहानी है। एक राजा ऐल एक बार देव इलाके के जंगल में शिकार खेलने गए थे। शिकार खेलने के समय उन्हें प्यास लगी। उन्होंने अपने आदेशपाल को लोटा भर पानी लाने का निर्देश दिया। आदेशपाल पानी की तलाश करते हुए एक पानी भरे गड्ढे के पास पहुंचा। वहां से उसने एक लोटा पानी लेकर राजा को दिया। राजा के हाथ में जहां-जहां पानी का स्पर्श हुआ। वहां का कुष्ठ ठीक हो गया। बाद में राजा ने उस गड्ढे में स्नान किया और उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। उसके बाद उसी रात जब राजा रात में सोए हुए तो सपना में दिखा कि जिस गड्ढे में उन्होंने स्नान किया था।

उसी गड्ढे में तीन मूर्तियां हैं। राजा ने फिर उन मूर्तियों को एक मंदिर बनाकर स्थापित किया। मंदिर के पास तालाब है जिसका विशेष महत्व है। इस तालाब को सूर्यकुंड भी कहते हैं। इसी कुंड में स्नान के बाद सूर्यदेव की आराधना की जाती है। परंपरा के अनुसार प्रत्येक दिन सुबह चार बजे घंटी बजाकर भगवान को जगाया जाता है। उसके बाद भगवान की प्रतिमा को स्नान कराया जाता है। ललाट पर चंदन लगाकर नए वस्त्र पहनाएं जाते है. आदिकाल से भगवान को आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ हो रहा है।

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