खतरनाक है यह बीमारी, भारत में 20 फीसदी लोग है पीड़ित, ऐसे बचे…

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मानसिक स्वास्थ्य (mental health) वो होता है, जिसमें हमारा भावनात्मक (Emotional), मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कल्याण शामिल होता है। हमारी भागदौड़ इस पर ही टिकी रहती हैं। इसका स्वस्थ होना बहुत ही जरूरी हैं। यह हमारे सोचने, समझने, महसूस करने और काम को पूरा करने की क्षमता को प्रभावित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, मानसिक स्वास्थ्य से किसी व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का अहसास होता है, उसे यह भरोसा होता है कि वह जीवन के सामान्य तनाव का सामना कर सकता है और समाज के प्रति अपना योगदान देने में भी पूरी तरह सक्षम रहता हैं।

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मानसिक स्वास्थ्य के दो भाग

इंदौर स्थित ‘समर्थ साइकोथेरेपी एंड काउंसिलिंग सेंटर’ के मनोचिकित्सक डॉ. संजीव त्रिपाठी कहते हैं, ‘अगर हम चाहें तो मानसिक स्वास्थ्य को दो भागों में बांट सकते हैं। पहला, न्यूरोटिक समस्या और दूसरा साइकोटिक समस्या। न्यूरोटिक समस्याओं में अवसाद, चिंता या घबराहट और फोबिया आदि आते हैं, जबकि साइकोटिक समस्याओं में सिजोफ्रेनिया, पैरानॉयड डिसऑर्डर आदि आते हैं।’

 

सिजोफ्रेनिया क्या है?

इसके द्वारा व्यक्ति की स्पष्ट रूप से सोचने, समझने महसूस करने और व्यवहार करने की क्षमता को प्रभावित करता है। इस स्थिति में व्यक्ति कल्पना और वास्तविकता में अंतर नहीं कर पाता। इसके लक्षणों में सोचने या बोलने में असामान्यता, व्यवहार में असामान्यता, रोज की सामान्य गतिविधियों में रूचि खो देना आदि शामिल हैं।

पैरानॉयड डिसऑर्डर क्या है? 

हम अपने जीवन में किसी पर किसी तरह का संदेह हो सकता हैं। ऐसा करना हमारी सामान्य मानवीय प्रवृत्ति आता है, लेकिन जब यह किसी की आदत बन जाए और वह हमेशा संदेह से घिरा रहे, छोटी से छोटी हर एक बात पर संदेह करे तो यह पैरानॉयड पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है। इस समस्या से ग्रसित मरीज भ्रम में रहने लगते हैं। बेवजह बतों पर शक करना और शक का पक्के विश्वास में बदल जाना, पैरानॉयड पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के लक्षण हैं।

सेहत को प्रभावित कर सकता हैं मानसिक स्वास्थ्य

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ समस्याएं, जैसे- डिप्रेशन की वजह से हमें कई अन्य बीमारी होने का डर रहता हैं। अगर यह डिप्रेशन लंबे समय तक बना रहे तो हमारे शरीर में संबंधी रोगों का खतरा भी बढ़ा देता है। जीवन के इस बड़ी बीमारी को लेकर हमारा यह सवाल कि क्या स्ट्रेस (तनाव) जिंदगी के लिए घातक हो सकता है? इस सवाल के जवाब में डॉ. संजीव कहते हैं, ‘स्ट्रेस जानलेवा नहीं होता है, डिप्रेशन (अवसाद) जानलेवा हो सकता है। स्ट्रेस में आम तौर पर सुसाइडल थॉट (आत्महत्या के विचार) देखने को नहीं मिलते हैं। स्ट्रेस में आदमी आत्महत्या नहीं करता है, स्ट्रेस जब आगे बढ़कर डिप्रेशन तक पहुंच जाता है, तब आत्महत्या करने की संभावना बढ़ जाती है।’ ऐसे में आदमी जिदंगी को खत्म करने के फैसले तक पहुंच सकता हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों की संख्या सबसे अधिक है। इस संगठन से एक अनुमान लगाया गया हैं कि साल 2020 तक भारत की लगभग 20 फीसदी आबादी मानसिक बीमारियों से पीड़ित होगी। हालांकि इससे संबंधित कोई आंकड़ा अभी तक नहीं आया है, लेकिन इतना तो तय है कि देश में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। मानसिक बीमारी का सबसे बड़ा कारण हैं हमारा काम, काम के प्रति विश्वास को लेकर। ऐसे में इस बारे में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि जागरूकता की कमी के कारण ही मानसिक बीमारियों से ग्रसित कई मरीजों को गलत व्यवहार का भी सामना करना पड़ता है।

इस बीमारी में जितना अच्छा व्यवहार हमारे साथ होगा हम उतनी जल्दी इस खतनाक बीमारी से निकल पायेंगे। उसके लिए हमें खुशी भरे माहौल में रहना पड़ेगा। ज्यादा से ज्यादा समय परिवार वालों के साथ रहना चाहिए। अकेलें जितना रहेंगे तनाव उतना बढ़ेगा उतनी ज्यादा निगेटिव बाते सोचेंगे। कभी-कभी हमारे परिवार वाले इस बात को इतनी गहराई से लेते हैं कि वह हमें खुश रखने के लिए इस बीमारी से बाहर निकलने के लिए हमारी पूरी तरह से मदद करते हैं।

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