केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) के इस्तीफे की खबर सामने आते ही राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय से प्रदर्शन कर रहे छात्रों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई। पिछले एक महीने से अधिक समय से धरने पर बैठे छात्र इसे अपनी बहुत बड़ी नैतिक जीत मान रहे हैं। एनडीटीवी के रिपोर्टर रवीश रंजन शुक्ला से बातचीत के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों ने खुलकर अपनी भावनाएं साझा कीं। एक छात्र ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह इस देश के युवाओं के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है, क्योंकि अब भविष्य में कोई भी मंत्री अपनी जिम्मेदारी से भागने से पहले सौ बार सोचेगा। छात्रों का कहना है कि उनकी एकजुटता और संघर्ष ने आखिरकार रंग दिखा दिया है।
लाठीचार्ज से लेकर इस्तीफे तक का संघर्ष
प्रोटेस्ट साइट पर मौजूद एक छात्रा ने भावुक होकर बताया कि उनका यह अनशन और संघर्ष आसान नहीं था। पुलिस की लाठियां खाने और तमाम प्रशासनिक दबावों के बावजूद छात्रों ने हार नहीं मानी। प्रदर्शनकारियों का मुख्य गुस्सा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कार्यप्रणाली पर था, जिनके इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले एक महीने से लगातार प्रदर्शन चल रहा था। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हिंसा भड़क उठी और पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया। इस घटना के बाद यह विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया और देश के कोने-कोने से छात्र इसमें शामिल होने लगे।
सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके के आंदोलन का असर
छात्रों ने बातचीत में इस बात का भी विशेष जिक्र किया कि इस पूरे आंदोलन को देश के कई बड़े प्रेरणास्त्रोत लोगों का साथ मिला। एक अन्य छात्र ने बताया कि सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके जैसे चेहरों की मांगों के साथ-साथ छात्रों का यह सामूहिक प्रयास अब अपने मुकाम पर पहुंच गया है। छात्रों का मानना है कि इस पूरे विवाद की जड़ शिक्षा मंत्री का रवैया था और उनके हटने से अब व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जग गई है। प्रदर्शनकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकार आगे भी शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक और पारदर्शी सुधार जारी रखती है, तो वे अपने इस आंदोलन को पूरी तरह समाप्त करने पर विचार करेंगे।
भविष्य के लिए सबक और आगे की उम्मीदें
धर्मेंद्र प्रधान के इस ऐतिहासिक इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर मौजूद युवाओं में एक नया आत्मविश्वास देखने को मिल रहा है। छात्रों का कहना है कि यह घटना इस बात का प्रमाण है कि देश का युवा अब अपने अधिकारों के प्रति पूरी तरह जागरूक हो चुका है और शिक्षा के साथ खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस संकट के बाद शिक्षा मंत्रालय की कमान किसे सौंपती है और देश की युवा पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या नए और कड़े कदम उठाए जाते हैं।
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