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34 साल में 520 गुना बढ़ा ‘भगवान का खजाना’… 337 करोड़ का दान, 200 लोग फिर भी नहीं संभाल पाते नोटों का पहाड़!

राजस्थान के श्री सांवलिया सेठ मंदिर में दान 65 लाख से बढ़कर 337 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। जानिए कैसे 34 साल में 520 गुना बढ़ा भगवान का खजाना और क्यों 200 लोग भी नोट गिनने में जुटे रहते हैं।

Chittorgarh News

Chittorgarh News: राजस्थान के चित्तौड़गढ़ स्थित प्रसिद्ध श्री सांवलिया सेठ मंदिर एक बार फिर सुर्खियों में है, जहां दान का आंकड़ा हर साल नए रिकॉर्ड बना रहा है। वर्ष 1991-92 में जहां इस मंदिर में करीब 65 लाख रुपये का वार्षिक चढ़ावा आता था, वहीं अब 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 337 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। पिछले 34 वर्षों में यह वृद्धि करीब 520 गुना मानी जा रही है। भक्तों की गहरी आस्था और परंपराओं के कारण यह मंदिर देश के सबसे बड़े दान केंद्रों में शामिल हो चुका है।

व्यापारियों की अनोखी आस्था

इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि कई व्यापारी अपने बिजनेस में भगवान को ‘साझेदार’ मानते हैं। वे पहले ही तय कर लेते हैं कि मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा भगवान को समर्पित करेंगे। जैसे ही व्यापार में लाभ होता है, उसका हिस्सा सीधे मंदिर में दान कर दिया जाता है। यही वजह है कि दानपात्र में सिर्फ नकदी ही नहीं, बल्कि सोना-चांदी और विदेशी मुद्रा भी बड़ी मात्रा में मिलती है। यह परंपरा मंदिर की आय को लगातार बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है।

नोटों का पहाड़ और 200 कर्मचारियों की मेहनत

मंदिर का दानपात्र खोलना किसी बड़े बैंक ऑपरेशन से कम नहीं होता। यहां हर बार 200 से अधिक कर्मचारियों की टीम लगती है, जो कई चरणों में नोटों की गिनती करती है। यह प्रक्रिया कई दिनों तक चलती है। दीपावली और होली जैसे अवसरों पर दानपात्र खोलने पर करोड़ों रुपये एक साथ सामने आते हैं। हाल ही में एक बार में 56 करोड़ रुपये से अधिक की राशि निकली थी। मंदिर में 30 से 35 देशों की विदेशी मुद्रा भी दान में आती है, जिससे गिनती और भी जटिल हो जाती है।

विकास और आधुनिक व्यवस्था की ओर बढ़ता मंदिर

भक्तों की बढ़ती संख्या को देखते हुए मंदिर में लगातार बड़े विकास कार्य किए जा रहे हैं। करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से नए प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, जिसमें हाई-टेक कतार व्यवस्था, विशाल डोम और श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं। मंदिर का प्रबंधन राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के अधीन है और 1991 से यह आधिकारिक रूप से सरकारी नियंत्रण में संचालित हो रहा है। आज यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि प्रबंधन और दान व्यवस्था का एक अनोखा उदाहरण भी बन चुका है।

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