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लुप्त होती उड़ान को मिली नई आस! CM मोहन यादव ने छोड़े 5 दुर्लभ गिद्ध, अब GPS से होगी हर हरकत पर नजर

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने रायसेन के हलाली डैम क्षेत्र में 5 लुप्तप्राय गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा। भारतीय गिद्ध और सिनेरियस गिद्ध पर GPS-GSM ट्रांसमीटर लगाए गए हैं, जिससे उनकी गतिविधियों की निगरानी की जाएगी। जानिए पूरी खबर।

मध्य प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रायसेन वन मंडल के हलाली डैम क्षेत्र में पांच लुप्तप्राय गिद्धों को उनके प्राकृतिक आवास में मुक्त किया। यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि जैव विविधता संरक्षण की दिशा में गंभीर प्रयास का हिस्सा था। मुक्त किए गए गिद्धों में चार भारतीय गिद्ध (लॉन्ग-बिल्ड वल्चर) और एक सिनेरियस गिद्ध शामिल है।

इन सभी गिद्धों को जीपीएस-जीएसएम ट्रांसमीटर से लैस किया गया है, जिससे उपग्रह के माध्यम से उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा सकेगी। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इन पक्षियों को पहले घायल अवस्था में बचाया गया था और भोपाल स्थित संरक्षण केंद्र में उनका उपचार किया गया। स्वस्थ होने के बाद विशेषज्ञों की निगरानी में उन्हें फिर से जंगल में छोड़ा गया। इस पहल का उद्देश्य न केवल इन गिद्धों को सुरक्षित वातावरण देना है, बल्कि उनकी प्राकृतिक जीवनशैली को समझना और भविष्य की संरक्षण योजनाओं को मजबूत बनाना भी है।

कौन हैं ये दुर्लभ मेहमान? प्रजातियों की खासियत

मुक्त किए गए पांच गिद्धों में से एक सिनेरियस गिद्ध है, जिसे आम भाषा में ‘काला गिद्ध’ भी कहा जाता है। यह दुनिया के सबसे बड़े उड़ने वाले पक्षियों में गिना जाता है। लगभग डेढ़ वर्ष आयु के इस प्रवासी पक्षी को 19 दिसंबर 2025 को विदिशा जिले के सिरोंज क्षेत्र से रेस्क्यू किया गया था। यह प्रजाति मध्य एशियाई फ्लाई-वे के तहत 30 से अधिक देशों की यात्रा करती है, इसलिए इसकी निगरानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इसके अलावा चार भारतीय गिद्ध भी छोड़े गए, जिन्हें लॉन्ग-बिल्ड वल्चर कहा जाता है। यह प्रजाति मध्य भारत के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत जरूरी है। पिछले दो दशकों में दवाइयों और अन्य मानवीय कारणों से गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। ऐसे में इन प्रजातियों की वापसी पर्यावरण संतुलन के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे प्रयास लगातार जारी रहे, तो गिद्धों की घटती आबादी को फिर से स्थिर किया जा सकता है।

GPS निगरानी से क्या होगा फायदा?

इन गिद्धों पर लगाए गए GPS-GSM ट्रांसमीटर संरक्षण की दृष्टि से अहम भूमिका निभाएंगे। वाइल्डलाइफ एसओएस, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सहयोग से उपग्रह टेलीमेट्री तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इससे गिद्धों के आवागमन, भोजन के स्थान, विश्राम क्षेत्र और संभावित खतरों की सटीक जानकारी मिल सकेगी।

अक्सर गिद्ध बिजली की लाइनों से टकराकर या जहरीले भोजन के कारण मौत का शिकार हो जाते हैं। जीपीएस निगरानी से यह पता चल सकेगा कि वे किन क्षेत्रों में ज्यादा समय बिताते हैं और कहां उन्हें जोखिम है। इससे वन विभाग को समय रहते कदम उठाने में मदद मिलेगी। खासकर सिनेरियस गिद्ध जैसे प्रवासी पक्षी, जो कई देशों की सीमाएं पार करते हैं, उनकी ट्रैकिंग से अंतरराष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी।

‘पर्यावरण के प्रहरी’ क्यों कहलाते हैं गिद्ध?

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि भारतीय परंपरा में गिद्धों को शक्ति और त्याग का प्रतीक माना गया है। उन्होंने रामायण का उल्लेख करते हुए जटायु और सम्पाती की कथा का स्मरण किया, जिन्होंने साहस और बलिदान की मिसाल पेश की। उन्होंने कहा कि गिद्ध सिर्फ पौराणिक कथाओं में ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है, क्योंकि वे मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं। इससे बीमारियों के फैलने का खतरा कम होता है। यदि गिद्धों की संख्या घटती है, तो मृत जानवरों के अवशेष लंबे समय तक खुले में पड़े रहते हैं, जिससे संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ जाती है।

मध्य प्रदेश लंबे समय से देश में गिद्धों की समृद्ध आबादी का केंद्र रहा है। यहां भारतीय गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, मिस्र गिद्ध और हिमालयन ग्रिफॉन जैसी कई प्रजातियां पाई जाती हैं। हाल ही में वल्चर एस्टिमेशन-2026 के पहले दिन दक्षिण पन्ना वन प्रभाग में एक हजार से अधिक गिद्धों का अवलोकन किया गया, जो हाल के वर्षों में सबसे अधिक संख्या मानी जा रही है। यह संकेत देता है कि संरक्षण के प्रयास धीरे-धीरे सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं।

इस पूरी पहल से साफ है कि सरकार और वन विभाग गिद्धों की घटती संख्या को लेकर गंभीर हैं। जीपीएस निगरानी, उपचार और पुनर्वास जैसे कदम आने वाले समय में वन्यजीव संरक्षण के मॉडल के रूप में सामने आ सकते हैं।

 

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