कोरोना काल में दो गंभीर दिक्कतों से जूझ रही हैं महिलाएं, सेहत के लिए बना खतरा

88

कोरोना काल के दौरान लगाए गए लॉकडाउन ने समाज के हर वर्ग को परेशान कर दिया है। इस दौरान देश को कोई भी सेक्टर ऐसा नहीं बचा है जो प्रभावित न हुआ हो। इसका व्यापक असर स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी पड़ा है। कोरोना के चलते अस्पतालों पर जहां इसके इलाज का दबाव बढ़ गया तो दूसरी ओर अन्य बीमारी से ग्रसित मरीज स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह गए। महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य पर भी इसका असर देखा गया है। महिलाओं को गर्भपात और गर्भनिरोध की पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल सकी। इसके कारण उन्हें गर्भपात के असुरक्षित तरीकों से गुजरना पड़ा। आईपास डिवेलपमेंट फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के तीन महीनों के दौरान 18 लाख 50 हजार महिलाओं ने असुरक्षित गर्भपात का सहारा लिया।

इसे भी पढ़ें: चीन-पाकिस्तान को एक ही वक़्त में माकूल जवाब देगा भारत का यह नया हथियार

बता दें कि आईपास फाउंडेशन महिलाओं के यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाला गैर-सरकारी संगठन है। इस फाउंडेशन ने लॉकडाउन के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव का महिलाओं पर इसके पड़े असर को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की गई है। तीन महीनों में होने वाले अनुमानित गर्भपात के आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है। इसमें लांसेंट की वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के आंकड़ों को भी शामिल किया गया है। लांसेंट की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर वर्ष में एक करोड़ 56 लाख (1.56 करोड़) गर्भपात होते हैं। इन गर्भपातों में से 73 प्रतिशत केमिस्ट से मिलने वाली दवाइयों, 16 प्रतिशत निजी स्वास्थ्य सुविधाओं, 6 प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं और 5 प्रतिशत पारंपरिक तरीकों से किए जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक तीन महीनों में औसत 39 लाख गर्भपात होने का अनुमान था लेकिन इनमें से 18 लाख 50 हजार गर्भपात किन्हीं कारणों से नहीं हो पाए। गर्भपात में सबसे अधिक दिक्कत लॉकडाउन के शुरुआती 40 दिनों में हुई। इस दौरान 59 प्रतिशत गर्भपात नहीं हो पाए। इसके बाद अगले अगले 14 दिनों यानी लॉकडाउन 2 में 46 प्रतिशत। इसी क्रम में लॉकडाउन 3 में 39 प्रतिशत गर्भपात नहीं हो सके। फिलहाल अनलॉक शुरू होते ही हालात भी सुधरते गए। 1—24 जून के बीच में इस मामले में काफी सुधार देखा गया।

गर्भपात के आंकड़ों को जुटाने के लिए तीन माध्यमों से जानकारी हासिल की गई। अधिकत्तर महिलाएं गर्भपात के लिए सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं को चुनती हैं या केमिस्ट से इसकी दवाइयां लेती हैं। गैर-कानूनी तरीके से भी गर्भपात कराए जाने का धंधा चल रहा है। लेकिन इसे रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पताल को शामिल किया गया है, ​जबकि निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में क्लीनिक्स, नर्सिंग, मैटरनिटी होम्स और अस्पताल को लिया गया है।

आईपास फाउंडेशन के सीईओ विनोज मेनिन इस रिपोर्ट को लेकर बताते हैं कि आपदा प्रबंधन के दौरान प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा प्रभावित होती हैं। इसके चलते अनचाहे गर्भधारण और असुरक्षित गर्भपात की समस्या बढ़ जाती है। ऐसी ही स्थितियां कोरोना काल के दौरान भी बनीं। इस दौरान महिलाओं को गर्भपात और गर्भनिरोध के सुरक्षित तरीके नहीं मिल सके उसके कई कारण हैं।

  • लॉकडाउन के दौरान अस्पतालों तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो गया था। परिवहन के सभी साधन बंद थे तो वहीं बाहर निकलने पर संक्रमण का खतरा बढ़ गया था।
  • इस दौरन बाहर निकलने वाले को पुलिस को कारण बताना पड़ता था। ऐसे में गर्भपात का कारण बताना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। इसके चलते भी लोग बाहर निकलने में संकोच रहे थे।
  • इस बीच मेडिकल की दुकानें कम खुल रही थीं। सभी मेडिकल स्टोरों पर गर्भपात की दवाएं उपलब्ध भी नहीं होती।
  • कोरोना के संक्रमण के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव काफी बढ़ गया है। अधिकत्तर अस्पतालों को कोविड फैसिलिटी में बदल दिया गया है। इसके चलते अन्य बीमारियों के इलाज पर व्यापक असर पड़ा है।

इसे भी पढ़ें: कोरोना वैक्सीन में देरी अर्थव्यवस्था के लिए पड़ेगा भारी, जानिए कितना लुढ़क सकती है जीडीपी