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देश की लोककला को बड़ा झटका! आखिर किस महान कलाकार ने 70 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा?

Padma Vibhushan पंडवानी गायिका तीजन बाई का 70 वर्ष की उम्र में रायपुर एम्स में निधन। जानिए उनके संघर्ष, सम्मान, पंडवानी गायन के सफर और भारतीय लोककला में उनके अमूल्य योगदान की पूरी कहानी।

Tijan Bai

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पंडवानी गायन की सबसे बड़ी पहचान मानी जाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित तीजन बाई (Tijan Bai) अब हमारे बीच नहीं रहीं। 70 वर्ष की उम्र में उन्होंने रायपुर एम्स में रविवार तड़के करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से बीमार थीं और अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला जगत, लोक संगीत प्रेमियों और उनके चाहने वालों में शोक की लहर दौड़ गई। तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज़ और अनोखी प्रस्तुति से पंडवानी जैसी पारंपरिक लोकगायन शैली को देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों तक पहुंचाया। उनके जाने से भारतीय लोककला ने अपना एक ऐसा सितारा खो दिया है, जिसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा और आने वाली पीढ़ियां भी उनके कला-सफर से प्रेरणा लेंगी।

संघर्ष से शिखर तक का रहा प्रेरणादायक सफर

8 अगस्त 1956 को भिलाई के पास स्थित गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। बताया जाता है कि उन्होंने महज 13 साल की उम्र में पहली बार 10 रुपये के लिए पंडवानी का गायन किया था। उस दौर में महिलाओं के लिए इस शैली में मंच पर खड़े होकर प्रस्तुति देना परंपरा के खिलाफ माना जाता था, लेकिन उन्होंने सामाजिक सोच को चुनौती देते हुए कापालिक शैली में खड़े होकर पंडवानी गाना शुरू किया। उनकी भारी आवाज़, प्रभावशाली अभिनय और महाभारत के पात्रों को जीवंत करने की कला ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता गांवों से निकलकर पूरे देश में फैल गई। उनके इसी अलग अंदाज ने उन्हें भारतीय लोककला की सबसे बड़ी पहचान बना दिया।

इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति के बाद बदली किस्मत

तीजन बाई के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उनके प्रयासों से तीजन बाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने का अवसर मिला। इस मंच के बाद उनके करियर ने नई ऊंचाइयों को छू लिया। उन्होंने भारत के अलावा यूरोप, अमेरिका, एशिया और कई अन्य देशों में पंडवानी की शानदार प्रस्तुतियां देकर भारतीय लोकसंस्कृति का परचम लहराया। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले, जिन्होंने उनके कला जीवन को और अधिक गौरवशाली बनाया।

निजी जीवन में झेले कई संघर्ष, लेकिन कभी नहीं छोड़ा संगीत

तीजन बाई का निजी जीवन भी आसान नहीं रहा। उनकी शादी महज 12 साल की उम्र में हो गई थी। शादी के बाद उन्होंने पंडवानी गायन जारी रखा, लेकिन समाज की परंपराओं के खिलाफ जाकर मंच पर प्रदर्शन करने की वजह से उन्हें अपनी ही पारधी समुदाय से बहिष्कृत कर दिया गया। उन्हें पति का घर भी छोड़ना पड़ा और जीवनयापन के लिए लोगों के घरों में काम करना पड़ा। कई बार उन्हें भोजन के लिए भी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा। लगातार मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके निधन के साथ भारतीय लोक संगीत का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी शैली और उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी। आने वाली पीढ़ियां उन्हें पंडवानी की सबसे महान गायिका के रूप में याद करेंगी।

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