देश में रसोई गैस यानी LPG की कीमतों ने एक बार फिर लोगों को चौंका दिया है। हाल ही में कीमतों में हुई बढ़ोतरी के बाद 5 किलो वाले छोटे सिलेंडर और 14.2 किलो वाले घरेलू सिलेंडर के दामों के बीच बेहद कम अंतर देखने को मिला है। जहां छोटा सिलेंडर करीब 800 रुपये के आसपास पहुंच गया है, वहीं बड़े घरेलू सिलेंडर की कीमत लगभग 900 रुपये के करीब बनी हुई है। यानी सिर्फ करीब 100 रुपये ज्यादा देकर तीन गुना ज्यादा गैस मिल रही है। यही वजह है कि आम लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर यह कीमतों का फॉर्मूला क्या है और इसमें इतना बड़ा अंतर क्यों है।
प्रति किलो गैस का हिसाब—यहीं छिपा है पूरा खेल
अगर इन दोनों सिलेंडरों की कीमत को प्रति किलो के हिसाब से देखें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। 14.2 किलो वाले घरेलू सिलेंडर में प्रति किलो गैस की कीमत करीब 60 से 65 रुपये के बीच बैठती है। वहीं 5 किलो वाले छोटे सिलेंडर में यही कीमत बढ़कर लगभग 160 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। यानी छोटे सिलेंडर में गैस करीब तीन गुना महंगी पड़ती है। इसी तरह 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर में भी प्रति किलो कीमत छोटे सिलेंडर के करीब ही रहती है। इसका मतलब साफ है कि छोटे और कमर्शियल सिलेंडर उपभोक्ताओं के लिए ज्यादा महंगे साबित हो रहे हैं, जबकि घरेलू सिलेंडर अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है।
किन लोगों पर पड़ता है सबसे ज्यादा असर?
छोटे 5 किलो वाले सिलेंडर का इस्तेमाल मुख्य रूप से ऐसे लोग करते हैं, जिनके पास स्थायी पता या दस्तावेज नहीं होते। इसमें छात्र, प्रवासी मजदूर, किराए पर रहने वाले लोग और छोटे दुकानदार शामिल हैं। यह सिलेंडर हल्का होता है और आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है, इसलिए इसका इस्तेमाल चाय की दुकानों, ढाबों और छोटे कारोबारियों के बीच भी ज्यादा होता है। लेकिन कीमतों में इस तरह की बढ़ोतरी का सीधा असर इन्हीं वर्गों पर पड़ता है, क्योंकि उनकी आय सीमित होती है और खर्च बढ़ने से उनका बजट बिगड़ जाता है।
कैसे तय होते हैं LPG के दाम
भारत में LPG सिलेंडर की कीमतें सीधे सरकार तय नहीं करती, बल्कि तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार के आधार पर इन्हें तय करती हैं। इसमें कच्चे तेल की वैश्विक कीमत, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और आयात लागत जैसे कई कारक शामिल होते हैं। कंपनियां ‘इंपोर्ट पैरिटी प्राइस’ (IPP) के फॉर्मूले के आधार पर कीमत तय करती हैं, जिसका मतलब है कि गैस को विदेश से खरीदकर भारत लाने में जितना खर्च आता है, उसी के आधार पर कीमत तय होती है। इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन, टैक्स और डिस्ट्रीब्यूशन लागत भी इसमें जुड़ जाती है। यही वजह है कि अलग-अलग आकार के सिलेंडरों की कीमतों में संतुलन हमेशा समान नहीं होता और कई बार छोटा सिलेंडर ज्यादा महंगा पड़ता है।
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